सन 2005 जनवरी,
इस वक्त मेरी माली हालत ऐसी नही थी की मै कुछ एक्सट्रा खर्च अफोर्ड कर सकु।
अमरनाथ यात्रा के बारे मे बहुत कुछ सुना पढ़ा था मैने।
उस वक्त मेरी पहचान मे सिर्फ एक विजय भैया थे जो अमरनाथ यात्रा कर चुके थे,इस वजह से मै उनके पास गया खर्च और बाकी जानकारीयो के लिये।
बाबु,पिछले साल मेरे 35000 रूपये खर्च हुए थे।
विजय भैया के इस जवाब ने मेरे सारे कस बल जोश पर फ्रीज का बिल्कुल ढंडा पानी गीरा दिया।
कहॉ से आयेगा 35-40 हजार रूपये?
सोच कर इरादा बदल दिया।
सन 2005 फरवरी,
मेरे एक चड्डी मित्र ने बुला कर पुछा-अमरनाथ यात्रा जाना है?
दिल तो बल्लियो उछल दिया,
पर खर्च याद आते ही सारा जोश जीरो🙁🙁🙁
पर मित्र(राम जी सोनी)ने बोला,रेजीस्ट्रेशन करा लो,स्लीपर की टिकेट बुक करा लो,बाकी भोले की मर्जी?
बुलाना होगा तो बुला लेंगे।(सनद रहे,मेरे इस मित्र ने अभी तक अमरनाथ के दर्शन नही किये है।
मेरे पास कुल 300/- रूपये थे।मैने अपने मित्र को बता दिया।
मार्च 2005,
बाकी उसने अपने पास से मिला कर टिकेट और यात्रा रेजीस्ट्रेशन करा दिया।
बाकी मिलते है अगले भाग मे।
श्री अमरनाथ यात्र:भाग-2
टिकेट बन के मेरे पास,रेजीस्ट्रेशन भी कम्पलीट।
बट जेब मे फूटी कौड़ी भी नही।
500 रूपये का कर्ज मेरे यार का अलग।
दिन बितते देरी नही लगी।
जुलाई 15 की यात्रा थी मेरे शहर सीवान से अमरनाथ एक्सप्रेस की।
दिनांक 11 जुलाई 2005:-
कुछ उधारी फंसा था,जिनके पास दौड़ दौड़ कर थक चुका था,
आज सुबह से कुछ ऐसे लोगो ने खुद बिना तकाजा ला कर पैसे दे दिये।
शाम तक मै 8000/- का मालीक था,अपने दोस्त का कर्ज चुका कर।
दिनांक 12 जुलाई,
मेरे भैया को पता चला की मैने अमरनाथ जी के दर्शन के लिये तैयारीयॉ शुरू की है,15000/- मेरी जेब मे।
कुल 23000/- का मालीक था अब मै।
दिनांक 13 जुलाई,
उस वक्त मै पार्ट टाईम इलेक्ट्रोनिक्स आईटम रिपेयरिंग का का काम करता था,सुबह 9 बजे से रात 8:45 तक मानो सीवान मे मै ही इकलौता मैकेनिक था,इस कदर भीड़।
और भोले कृपा से सभी का काम भी कर के फ्री।
टोटल कमाई 17000/-,(ध्यान रहे सन 2005 की बात है)
अब टोटल 40000/- मेरे पास थे।
दिनांक 14 जुलाई,
मेरे कुछ मित्रो ने भी मेरा पैसा फंसाया हुआ था,पता नही कौन सी सद्बुद्धी ने उन्हे आज पैसे देने को राजी किया मगर 17000/- आज फिर मेरी जेब मे।
टोटल 57000/- का मालीक था इस वक्त मै।
भोले का बुलावा आ गया था,और मै बहुत खुश था की विजय भैया ने 40 हजार का खर्च बताया था जबकी मेरे पास 57000/- थे।एक अलग गर्व हो रहा था मुझे,बाबा बर्फानी के कदमो मे सिर झुकाने के लिये दिल से तो बहुत पहले तैयार था अब इकोनोमिली भी तैयार था।
कम से कम पैसो की समस्या अब नही थी।बस भोले की कृपा थी सब🙏
जुड़े रहीये।अगला भाग मे फिर मिलते है।
श्री अमरनाथ यात्रा:भाग-3
15 जुलाई 2005,
सीवान स्टेशन से अमरनाथ एक्स का टाईम सुबह 10:40 था,
और हम(मै और मेरे ग्रूप के अन्य 9 साथी)सुबह 9 बजे नहा धो कर बुढ़िया माई(मॉ दुर्गा का एक मंदिर)के दर्शन और आशिर्वाद को ले कर सारे सामान के साथ 10 बजे स्टेशन पर थे।
कहते है इन्तेजार वही होता है जहॅ शिद्दत से मिलन की ख्वाहिश हो।
ट्रेन 1-2-3-4-5-6 घंटे होते हुये कुल 11 घंटे बाद आयी(उस वक्त इंटरनेट का जमाना नही था कि 139 या किसी एप्स से जानकारी ले लेते)।
बहरहाल इंतेजार इंतेजार मे ट्रेन मे खाने के लिये घर से बनवा कर लाये खाने का आधा हिस्सा हम गटक चुके थे।
और रात का डिनर अभी बाकी था।
खैर हमने माता रानी का एक गगनभेदी जयकारा लगाया और ट्रेन मे अपनी अपनी सीटो पर जा कर बैठ गये।
5 मिनट के बाद ट्रेन खुली और हमारी भोले भंडारी से मिलन की आश लिये ट्रेन ने सीवान को विदा किया।
ट्रेन मे हम सभी अपनी अपनी बर्थ पर जा कर बैठ गये।मन मे एक अति उत्साह वाली बेचैनी थी।जिन पहाड़ो को अभी तक मैने TV और फिल्मो मे देखा था उनसे रू ब रू होने की,मेरे आस पड़ोष के लोगो की अधुरी रह गयी यात्रा की यादो की,और सबसे बढ़कर उस बाबा बर्फानी से मिलने की बेचैनी जो दुर पहाड़ो पर बैठा अपने भक्तो का इतना कठिन इम्तेहान ले रहा था।
मै अपनी खिड़की वाली बर्थ किसी से भी शेयर करने को तैयार नही था,आखिर बचपन से पहाड़ो को देखने की चाहत जो थी।
इससे पहले मैने सिर्फ बाबाधाम मे जसीडीह से दुमका जाते हुये पहाड़िया देखी थी,मगर जो फिल्मी छवी मेरे मन मे छपी हुई थी उन विराट पहाड़ो से मिलने का प्रथम मौका था मेरा।
अंताक्षरी खेलते हुये हम कब सो गये पता भी नही चला।
अगले दिन ट्रेन मे ही दिनचर्या निपटा कर हमने बाकी का बचा घर का सारा खाना चट कर दिया।
पठानकोट मे घोषणा हुई की ट्रेन एक घंटे रूकेगी।सो हमने समय का सदुपयोग करते हुये पटरी के बगल से गुजरी पाईप से गिरते हुये पानी मे स्नान कर लिया।
शाम 7 बज गये थे मगर लग ही नही रहा था,मानो अभी 4 ही बजे हो।और हम जम्मूतवी स्टेशन पर उतर गये।
यहॉ से हमने एक टैम्पोट्रेवलर लिया और स्टेडियम को प्रस्थान कर गये।
रास्तो के नजारो ने मुझे उतना उत्साहित नही किया जितना मैने सोचा था।मेरी नजरे हर पहाड के शिर्ष पर वो फिल्मी और मैगजिनो वाली बर्फ ढुंड रही थी(हंसना मना है,प्रथम यात्रा थी मेरी✋✋✋)जो अभी तक नही मिली।
खैर हम फाईनली चेकिंग के बाद स्टेडियम मे प्रवेश कर के घर से लाये प्लास्टिक को बिछा कर एक जगह पर कब्जा जमा चुके थे।
वही पर कुछ लोग खाने मे लग गये और कुछ लोग बालटाल के लिये बस करने की लाईन मे लग गये।
रोमांच के साथ कुछ अंजानी सी सिहरन भी हो रही थी आस पास इतने सुरक्षा बलो को देख कर।
हम भी अब खा पी कर सोने की कोशिश मे लग गये क्योकि सुबह 3 बजे उठ कर हमे फ्रेश हो कर 4 बजे तक हर हाल मे बस मे बैठ जाना था।
`जयकारा बीर बजरंगी-हर हर महादेवʼ
के नारो से 4:30 बजे सुबह हमारी यात्रा का शुभारम्भ हो गया।
बस ने धीरे धीरे आगे बढ़ते हुये भोले के करीब पहुचने का सफर जारी रखा।ज्वाहर टनल मे हम सभी का जोश देखते बनता था।जयकारो से लगता था कि हम बाबा बर्फानी तक अपनी आवाज पहुचा देंगे।
रास्ते मे 2 जगह गिरते झरनो मे स्नान और लंगरो मे खाते हुये आखिरकार हम बालटाल पहुच ही गये।
बस रूकी,और हम जिस जोश से उतर कर दौड़े वो जोश 30 सेकेंड मे ठंडा पड़ गया।
आगाज ऐसा था तो अंजाम की हम कल्पना ही कर सकते थे।
हम सभी का यह प्रथम अमरनाथ जी का यात्रा था।
हम घर पर बिना थके मिलो चल सकते है मगर यहॉ नही।10 कदम के बाद हमारी कल्पना मे वो गली के कुत्ते घुम जाते थे जो जीभ निकाल कर हाफते थे।🙁🙁🙁
हमारी भी वही स्थिती हो गई थी।🙄🙄🙄
खैर 1 किलोमिटर का बस सटैंड से अपने टेंट तक वो सफर हमने वैसे ही हाफते कॉपते 1 घंटे मे पुरी की और टेंट मे पहुचते ही सारे गर्म कपड़े निकाल कर पहन कर स्लीपिंग बैग मे घुस कर सो गये।
शेष अगले भाग में।
श्री अमरनाथ यात्रा:भाग-4
मेरी 4 बजे उठने की आदत ने यहॉ भी मुझे 4 बजे उठा दिया।मै नित्यकर्म(ठंडे पानी की वजह से 40 मिनट से अधिक लगा,पानी जब उंगलियो पर गिरी तो उंगिया मोड़ने मे 10 मिनट लग गये) से निपट कर ब्रश करने के बाद वही एक टेंट वाले के पास,जो 20 रूपये बाल्टी के हिसाब से गर्म पानी दे रहा था,उससे 5 बाल्टी पानी(मै गर्म पानी मे ठंडे पानी को मिलाने का रिस्क नही लेना चाहता था।अभी ट्वायलेट मे मुझे इसका गुढ़ ज्ञान😎😎😎 प्राप्त हो चुका था)।
मेरे टेंट के कुछ लोग मुझे बाहर खड़े देख रहे थे।
मैने हर हर भोले का नाम लिया और एक-एक कर पॉचो बाल्टी को सिर पर गिरा के गीला तौलिया वही फेक कर एक सुखा तौलिया लपेट P.T.USHA को फेल करते हुये अपने टेंट मे सिधा अपने स्लीपिंग बैग मे जा घुसा।
अब मै बिना शरीर गर्म हुए बाहर किसी भी कीमत पर निकलने वाला नही था।
35-40 मिनट बाद जब लगा की शरीर अब बाहर के तापमान मे ढल गया है तब मै बाहर निकला और कपड़े पहन कर ग्रूप मे सबसे पहले तैयार हो कर टेंट के पीछे बहती नदी के पास बैठ कर प्रकृति की सुंदरता को निहारने लगा।
एक भाई ने मुझे 4-5 बाल्टी पानी से नहाता देख ठंडा पानी एक लोटा सिर पर डाला और वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ता हुआ-साथ मे मुझे गाली 🤬🤬🤬भी देता हुआ,चार रजाईयो को अपने उपर डाल कर लेट गया।
उसने ना मुझसे पुछा था और ना मैने किसी को बताया था मैने गर्म पानी से स्नान किया है😁😁😁
खैर किसी तरह सबने बारी बारी गर्म पानी से स्नान कर एक लंगर मे छक कर छोले भटुरे जलेबी खाई और फिर जयकारो के बिच हमारी पैदल यात्रा आरम्भ हुई।
मै भी पुरे जोश मे जयकारे लगाते हुये आगे बढ़े जा रहा था।वापसी वाले मुरझाये चेहरो को देख कर हम और जोश मे जयकारे लगा रहे थे(उनके मुरझाये चेहरे और मेहराई आवाज का राज मुझे वापसी मे पता चला)।
मेरे साथ एक बुजुर्ग भी थे मोहन चा,वो कुछ दुर चलने के बाद थक गये।आस पास घोड़े वाले हमे घोड़े से चलने को मनाने लगे।मैने मोहन चा के लिये घोड़ा कर लिया।
पर जैसे ही घोड़ा एक मोड़ पर धुमा,नीचे घाटी का नजारा देख वो तुरंत घोड़े से उतर गये।अब वहॉ कोई इतना ज्यादा चौड़ा रास्ता तो था नही की वो घोड़े वाला हमारे साथ चलता? सो वो आगे इन्तेजार करने को बोल कर आगे बढ़ गया।
मेरे ग्रूप के एक साथी सुनिल भैया के शब्द थे-हुं## घोड़ा क्या होगा,हम तो खुद घोड़े है।
3-4 किलोमिटर चलते चलते ही मेरी समझ मे आ गया था कि क्यो यह यात्रा इतनी कठीन मानी जाती है।मगर हर कठिनाईयो का मनोबल तोड़ रहा था बाबा तक पहुचने वाले रास्ते का अनुठा सौन्दर्य।
अब जा कर मेरे सपनो के पहाड़ो ने मुझे अपनी झलक दिखानी शुरू की।दुर दुर तक जहॉ तक नजर जाती बस एक दुसरे से ऊचाई के होड़ लगाते पहाड़।जिनके जिनके मुकुट पर बर्फ का श्रृंगार।
जिधर नजर जाये बस बर्फ ही बर्फ।
धुप मे जाते ही पुरे शरीर मे चुनचुनाहट होने लगती,और छॉव मे जाते ही रजाई कम्बल की जरूरत पड़ने लगती।
4 किलोमिटर के बाद सुनिल भैया(जो खुद को घोड़ा बता रहे थे)रूक गये कि बिना घोड़े के मै नही जा पाउंगा।
निचे 1400 मे घोड़े वाले आने जाने के मिल रहे थे,अब वही एक तरफ का 1400 मांग रहे थे।मजबूरीवश 4 घोड़े किये गये ताकी जिसको जरूरत हो वो बैठ जाये,बाकी पर सामान रख दिया जाये।
इधर कुछ दुर चलते ही थक कर मोहन चा रूक जाते और घोड़े बुलाने की जिद्द कर देते थे।
और घोड़े वाले के एक मोड़ पर फिर घुमते ही नजारा देख कर उतर जाते थे।
अकेले उनके लिये अलग से 4 घोड़े हो गये।तब मैने एक ब्लैक चश्मा उन्हे दिया की अब आप इसे पहन कर ऑखे सिर्फ घोड़े के सिर पर रखे और इधर उधर ना देखे।तब जाकर उनका सिलसिला थमा।
संगम तक पहुचते पहुचते अचानक बारीश शुरू हो गई।सभी ने बरसाती पहन रखी थी सिवाय मेरे।
जब तक मै बरसाती पहनता तब तक मै आधा भींग चुका था।
संगम पहुचते मेरी सांस उखड़ने लगी।मै भी एक घोड़े पर बैठ गया।
मुझे बहुत तेज ठंड लगने लगी।और सिरदर्द से मानो बस फटने ही वाला था।मेरे मुह से आवाज तक निकालने की हिम्मत नही हो रही थी।
शाम 6 बजते बजते हमे पवित्र गुफा के भव्य दर्शन मिले।गुफा से 2 किलोमीटर पहले ही घोड़े वाले ने उतार दिया।यहॉ से हमे पैदल बाबा तक हाजीरी लगानी थी।मेरी खराब हालत की वजह से सभी मुझे वही आराम करने को कहने लगे।
चारो तरफ का नजारा बिल्कुल मेरे सपनो मे सजे पहाड़ो सरिखा।मेरी हालत बहुत बुरी थी।मगर प्रकृति की सुन्दरता और मेरे अराध्य शिव दर्शन की आश ने मेरे अंदर एक जोश भर दिया,चाहे यही मर जाऊ मगर बाबा के दर्शन जरूर करूंगा।
वो 2 किलोमिटर मुझे आज तक याद है।5 कदम चलता और 5 मिनट आराम करता,मेरी धड़कने जिस रफ्तार से धड़क रही थी की उसकी आवाज से मेरे कान फट रहे थे।
गुफा के नीचे सिढियो तक पहुचते पहुचते मेरे नाक से खुन गिरना स्टार्ट हो गया।
रूमाल मे बांध रखे कपूर को सुंघते वो सिढियाॅ चढनी मैने शुरू की।
आधी सिढ़ीयाॅ चढ़ते चढ़ते मुह से भी हल्का हल्का खुन आना शुरू हो गया।
झुठ नही बोलुंगा।हर एक सिढी चढते हुये मै रूक कर हजार बार कसम खा रहा था की दुबारा नही आउंगा।
खैर कितनी भी कठिनाईयॉ हो कट ही जाती है।और जब सिढ़ीयाॅ समाप्त हुई और बाबा के दिव्य दर्शन हुये तो मै सम्मोहित सा हो गया।वही मुझे दोनो अमर कबुतरो के भी दर्शन हुये।
मै भी रोता-मरता जब बाबा के सम्मुख पहुचा तो शिव परिवार को साक्षात सामने देख मेरी ऑखे भरी थी।एक उम्मीद से,बाबा के दरश से,हर कठिनाई को झेलते हुये मंजील को सामने देख मै बाबा बर्फानी से लिपट गया।(उस वक्त तार की जाली वगैरह नही लगी थी,हम नंगे पैर उपर बाबा के पास तक जा सकते थे)।
भोलेनाथ ने मानो मुझे अपने आलिंगन मे यु जकड़ लिया था की मै सब कुछ भुल कर वही नतमस्तक हो गया।
मेरी ऑखो मे ऑसु थे।खुशी के ऑसु।अपने अराध्य के पास आने की खुशी के ऑसु,इतनी कठीन यात्रा पुरी करने के ऑसु,जीवन सफल हो गया महादेव के गले लग कर।
महादेव तु मेरा रक्षक,तु सबका रक्षक🙏🙏🙏
श्री अमरनाथ यात्रा:अंतिम भाग
भोले निचे आ जाओ-आरती का समय हो गया है।
3-4 बार जब ये आवाज मेरे कानो मे पड़ी तब मुझे अहसास हुआ की मै अभी तक भोले के चरणो मे था।
किसी तरह हिम्मत जुटा कर नीचे उतरा तब तक आरती शुरू।
शायद सातो जनम के पाप मेरे आज ही कटने थे🙁🙁🙁।एक तो नंगे पैर,उपर से महाभयकंर ठंड और अब बाबा की आरती।
इस वक्त तक तय था की मै यही से भोले के पास पहुच जाउंगा।मैने अपने वापस लौटने की उम्मीद छोड़ दी थी।
आरती खत्म होते ही मै किसी तरह बैठ बैठ कर सिढियो से नीचे उतरा और वापस अपने टेंट के पास पहुच कर बिना खाये पीये जीतनी रजाईया टेंट वाले से मिल सकती थी ले कर सो गया।सिर मे भयकंर दर्द,और एक अजीब सी बेचैनी।गरमी क्या होती है मै भुल चुका था।
मेरी इस हालत की वजह मुझे बस यही समझ मे आयी की मै जो बारीश मे भींग गया था वही से दिक्कते शुरू हुई थी।
मै इस हालत मे बस भोलेनाथ को याद करते हुए किसी तरह कब सोया पता नही।
सुबह सबके उठाने पर उठा।मेरी खुद की सोचने समझने की हालत नही थी।
मै एक घोड़े पर बैठ कर आखिरी बार बाबा की पवित्र गुफा की छवी ऑखो मे बसा कर लौटने को मुड़ गया।
वापसी मे आधे से ज्यादा रास्ता तय करने के बाद,नीचे से यात्रा आरम्भ करने वालो के जोशिले शब्द कानो मे गुंजने लगे।
उस वक्त मुझे याद आया की जब मै आते वक्त जोर जोर से जयकारे लगा रहा था तो वापसी वाले क्यो इतना मेहरा कर धीमे धीमे रिप्लाई कर रहे थे?🤔🤔🤔
अब तो मै बस गरदन ही हीला कर जयकारे मे अपनी सहमती दर्शा रहा था।
महादेव की कृपा रही और सही सलामत मै बालटाल अपने टेंट तक पहुच कर थोड़ी सी गर्म खीर लंगर से खा कर सो गया।
अगले दिन सुबह हम फिर कटरा के लिये प्रस्थान कर गये।मेरी हालत अभी भी वैसी ही थी।
सर्द हवाओ ने मानो मेरी रूह तक को ठंडा कर दिया था।
कटरा हम रात तक पहुच गये।मै और मोहन चा ने माता रानी के दर्शन को जाने मे अपनी असमर्थता दिखाई।हमे होटल मे सोता छोड़ कर बाकी सभी लोग माता के दरबार को चले गये।
1 दिन हमने होटल मे सोते हुये गुजारा।खाने के नाम पर सिर्फ गर्म दुध पी कर।
अगले दिन रात मे सभी लोगो के आने बाद हम शिव खोड़ी के लिये रवाना हो गये।वहॉ भी मै और मोहन चा नीचे ही ठहरे रहे,जब तक की बाकी ग्रूप के सदस्य लौट कर न आ गये।फिर उसी शाम हम जम्मु के लिये रवाना हो गये।
जम्मु मे रात्री विश्राम के बाद सुबह उठ कर एक ट्रेवलर द्वारा जम्मु लोकल घुम कर(डिटेल्स इस वजह से नही है की मै अपनी सीट पर ही बैठा रहा,अभी भी मेरी हालत ठीक नही थी)।
रात की ट्रेन से अमृतसर के लिये निकल पड़े।
सुबह हम अमृतसर पहुचे,तब तक कड़ी धुप की वजह से मेरी हालत मे कुछ सुधार हो चुका था।
हमने स्वर्ण मंदिर और जालीयॉ वाला बाग की सैर के बाद अटारी बार्डर के लिये गाड़ी की और निकल पड़े पाकीस्तानियो की खबर लेने।
यहॉ पहुच कर जो देशभक्ती ने मेरी रगो मे धुप संग मिल कर जो दौड़ना शुरू किया तो सेरेमनी खत्म होते होते मै वापस पुराना श्याम बन चुका था।
पसीने से मेरे अंडरगारमेंट्स तक भींग चुके थे।
और सारी ठंड मेरे रूह तक से निकल चुकी थी।
अमृतसर मे ही मैने किसी ढाबे पर किसी बुढ़िया माई के हाथो का बना दाल भात और फुलगोभी की शब्जी खाई।
क्या गजब का स्वाद था👌👌👌
और मै मानो जनम जनम का भुखा,2-3प्लेट चट कर गया।
अगले दिन सुबह सुबह मेरी ट्रेन थी,मेरे होम टाउन सीवान के लिये।और हम घर वापसी को निकल पड़े।
सबसे मजे की बात यह थी की अभी भी मेरे पास 53200/-रूपये बचे हुये थे,और मै विजय भैया को मन ही मन बहुत कोस रहा था।क्योकि मेरी यह यात्रा मात्र 3800/- मे पुरी हो गयी थी।
आखिर सिर्फ उनकी वजह से मै 4-5 साल देरी से अपने भोले से मिला था।
बहरहाल मेरी यात्रा अब समाप्त हुई।
आपको कैसी लगी?जरूर बताईयेगा।आगे लिखने का हौसला मिलेगा।
जय भोले,हर हर महादेव🙏🙏🙏
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें